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राजनांदगांव : डोंगरगढ़ सुदर्शन पहाड़ पर दिखा तेंदुआ, सोशल मीडिया का जमकर वीडियो हो रहा वायरल…

डोंगरगढ़ के प्रसिद्ध सुदर्शन पहाड़ पर उस वक्त हलचल मच गई, जब लोगों ने तेंदुए को खुलेआम पहाड़ की ढलानों पर घूमते देखा। शुरुआत में लगा कि शायद किसी ने मज़ाक किया है, लेकिन जैसे ही फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए, स्थिति साफ़ हो गई, एक तेंदुआ शहर के बिल्कुल करीब मौजूद है, और वह भी ऐसी जगह जहां सरकारी कॉलोनियां, अफसरों के आवास और आम लोगों की बस्तियाँ तेजी से उग आई हैं। घटना के तुरंत बाद वन विभाग सक्रिय हुआ, पिंजरे लगाए गए, टीमें तैनात हुईं, इलाके को घेरा गया। लेकिन सवाल यहीं से खड़े होते हैं क्या तेंदुआ गलती से शहर में घुस आया, या शहर ही धीरे-धीरे उसकी ज़मीन पर कब्जा कर गया?

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अब समझिए बड़ा एंगल: ‘शहर’ जंगल में घुस रहा है

यह मामला केवल एक वन्यजीव के आने का नहीं है। यह घटना शहर और जंगल के बीच बढ़ती टकराहट की बानगी है। सुदर्शन पहाड़, जहां तेंदुआ देखा गया, कभी पूरी तरह से वन क्षेत्र था। घना जंगल, जैव विविधता और शांत वातावरण इसे वन्यजीवों के लिए आदर्श बनाता था।लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस इलाके ने ‘तेज विकास’ का स्वाद चख लिया। अब पहाड़ की तलहटी में कॉलोनियां हैं, सरकारी भवन हैं, सड़कें हैं, स्ट्रीट लाइट्स हैं और जल्द ही शायद कुछ और मोहल्ले भी यहाँ बस जाएं। यानी शहर धीरे-धीरे उस इलाके में घुस गया जिसे कभी जंगल कहा जाता था। इसलिए जब तेंदुआ आया, तो वह भटका नहीं था—वह अपने ही घर के बचे-खुचे हिस्से में मौजूद था।

वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं?
वन्यप्रेमियों और विशेषज्ञों के मुताबिक यह तेंदुआ नया नहीं है। वर्षों से इसकी मौजूदगी इस पहाड़ी क्षेत्र में दर्ज होती रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले इंसानों की पहुंच यहां तक नहीं थी, इसलिए कोई मुठभेड़ नहीं होती थी। आज जब जंगल की सीमा घट गई है और इंसानी गतिविधियाँ बढ़ गई हैं, तो वन्यजीवों का सामना शहर से होना तय है। और जब वो सामने आते हैं, तो हम उन्हें ‘खतरा’ समझने लगते हैं, जबकि असल में खतरे की जड़ हमारी विकास नीति है, जो प्रकृति की जगह कंक्रीट को तरजीह देती है।

फिलहाल सरकारी आवासो के पास देखे जाने के बाद से ही वन विभाग ने तेंदुए को पकड़ने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया है,बीती रात से ही वन विभाग के अधिकारियों ने पिंजरा लगाकर तेंदुए की खोजबीन शुरू कर दी है लेकिन अब भी बड़ा सवाल यही है कि आख़िर तेंदुए के प्राकृतिक रहवास से उसे निकाल कर वन विभाग ले कहाँ जाएगा? इस पूरे मामले पर वन विभाग की ओर से अभी तक कोई ठोस जानकारी साझा नहीं की गई है। अधिकारी मामले को गंभीर बताते हुए मीडिया से अपनी नज़रे छुपा रहे हैं।

इस पूरे मामले में असली ज़रूरत है विकास की दिशा और उसकी नैतिकता पर पुनर्विचार करने की। क्या शहरों का विस्तार अनियंत्रित हो चुका है? क्या हम जंगलों को निगलते-निगलते उस बिंदु तक पहुंच चुके हैं, जहां इंसान और जानवर की टकराहट अब टालने वाली नहीं रही? सुदर्शन पहाड़ पर तेंदुए की मौजूदगी एक चेतावनी है। यह सिर्फ एक जानवर की कहानी नहीं, बल्कि उस संतुलन की टूटती कड़ी है, जिसमें शहर और जंगल सह-अस्तित्व में रहते थे।

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