राजनांदगांव:सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी मानसिक और आर्थिक रूप से टूट रहे हैं…

राजनांदगांव । राज्य में अनुकंपा नियुक्ति पर कार्यरत सहायक ग्रेड-3 कर्मचारियों के साथ बीते 10 वर्षों से चल रहा अन्याय अब बड़े विवाद का रूप ले रहा है। वर्ष 2013 में शासन द्वारा अनुकंपा नियुक्ति नियमों में संशोधन करते हुए सहायक ग्रेड-3 पद के लिए कंप्यूटर डिप्लोमा की अनिवार्यता से छूट दी गई थी। इसके स्थान पर एक नया प्रावधान जोड़ा गया कि ऐसे कर्मचारियों को नियुक्ति के दो वर्ष के भीतर हिंदी टाइपिंग की कौशल परीक्षा पास करनी होगी।

नियम के अनुसार यदि कोई कर्मचारी यह परीक्षा पास नहीं करता तो उसकी वार्षिक वेतन वृद्धि (इन्क्रीमेंट) तब तक रोकी जानी थी जब तक वह परीक्षा पास न कर ले। लेकिन विडंबना यह है कि 2013 से लेकर 2023 तक इस कौशल परीक्षा का कभी भी आयोजन नहीं किया गया।न तो विभाग स्तर पर न ही शासन स्तर पर और न ही किसी मान्यता प्राप्त संस्था के माध्यम से।

वेतन वृद्धि कुछ को मिली कुछ से छीनी गई दोहरा रवैया उजागर इसके बावजूद कई जिलों में प्राचार्यों और अधिकारियों द्वारा डिप्लोमा धारक कर्मचारियों की वेतन वृद्धि तो जोड़ दी गईनऔर कुछ को बिना परीक्षा के ही पात्र घोषित कर दिया गया। वहीं वहीँ अनुकंपा नियुक्ति के तहत आए कर्मचारियों जिनकी नियुक्ति उनके परिवार के भरण-पोषण के लिए की गई थी उनसे परीक्षा पास न करने का मूल्य वसूला जा रहा है। कई स्थानों पर अधिकारियों ने न केवल उनकी वेतन वृद्धि रोकी बल्कि अब 10 वर्ष बाद रिकवरी का मौखिक दबाव बनाना शुरू कर दिया है।

विडंबना यह भी है कि इन कर्मचारियों से विभागों ने हिंदी टाइपिंग के कार्य नियमित रूप से लिए। कई सहायक ग्रेड-3 कर्मचारियों को एस.डी.एम. ऑफिस, तहसील कार्यालय और अन्य सरकारी दफ्तरों में अटैच कर कार्य करवाया गया। जहां उन्होंने अपनी टाइपिंग और कंप्यूटर क्षमता का पूरा उपयोग किया।। इसके बावजूद जब वेतन वृद्धि और पदोन्नति (प्रमोशन) की बात आई तो विभाग ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए यह तर्क दिया कि परीक्षा पास नहीं की गई जबकि परीक्षा आयोजित ही नहीं हुई थी। उनका प्रमोशन भी कर दिया गया यह अधिकारियों की लापरवाही का नतीजा है। अब विभागीय आदेशों और प्रशासनिक असमानताओं के कारण हजारों अनुकंपा नियुक्त कर्मचारी मानसिक और आर्थिक दोनों तरह से परेशान हैं।

कई परिवारों की आजीविका प्रभावित हो रही है जबकि इस पूरे मामले में गलती कर्मचारियों की नहीं बल्कि विभागीय तंत्र की रही है। प्रभावित कर्मचारियों ने शासन और शिक्षा विभाग से यह मांग की है कि जब तक विभाग स्वयं कौशल परीक्षा का आयोजन नहीं करता तब तक किसी भी कर्मचारी से रिकवरी न की जाए।

जिन कर्मचारियों से हिंदी टाइपिंग का कार्य नियमित रूप से लिया गया है उन्हें स्वतः पात्र माना जाए।। बीते वर्षों की रोकी गई वेतन वृद्धि और प्रमोशन को तत्काल प्रभाव से बहाल किया जाए। यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं की उपेक्षा का उदाहरण बन गया है। जिन कर्मचारियों ने अनुकंपा के तहत सेवा आरंभ की थी आज वे अपने हक के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अब समय आ गया है कि शासन इस विषय को गंभीरता से संज्ञान में लेकर इन कर्मचारियों को न्याय दिलाए।