
राजनांदगांव।

“जल ही जीवन है, जल के बिना जीवन संभव नहीं है” — यह पंक्ति अब केवल नारा नहीं, बल्कि समाज और कृषि जगत के लिए एक गंभीर चेतावनी बन गई है। तेजी से घटते भूजल स्तर और बढ़ती गर्मी के कारण किसानों के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आने वाले ग्रीष्मकाल में धान की खेती लेना उचित होगा?
विधायक भोलाराम साहू का आह्वान – “जनसहयोग से ही टिकाऊ खेती संभव”
खुज्जी विधानसभा क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक माननीय श्री भोलाराम साहू ने कहा —
“जल संरक्षण केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि जनभागीदारी से एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ना चाहिए। यदि हम खेती में पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करें, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संकट को रोका जा सकता है।”
उन्होंने कहा कि ‘नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी’ जैसी योजनाएँ तभी सफल होंगी जब ग्रामीण स्तर पर लोग खुद पहल करेंगे।
“धान की जगह कम पानी वाली फसलों को अपनाना, वर्षा जल का संचयन और पुराने तालाबों का पुनर्जीवन ही भविष्य की खेती की कुंजी है।”

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष गीता घासी साहू का मत
राजनांदगांव जिला पंचायत की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती गीता घासी साहू ने कहा —
“हर खेत को पानी मिले, लेकिन संयम और बचत के साथ। जल संरक्षण अब सरकारी योजना नहीं बल्कि जनआंदोलन का विषय है। किसानों को अब ‘पानी बचाओ, फसल बचाओ’ की दिशा में सोचना होगा।”
उन्होंने कहा कि पंचायत स्तर पर जल जागरूकता अभियान चलाने से ग्रामीणों में जिम्मेदारी की भावना बढ़ेगी।
सफल कृषक श्री हिरेंद्र साहू का अनुभव
ग्राम खोरा टोला (गैदाटोला) निवासी सफल कृषक श्री हिरेंद्र साहू ने बताया कि उन्होंने इस वर्ष ग्रीष्मकाल में धान की जगह मूंग और मक्का की खेती की और कम पानी में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया।

“अब खेती को जल उपलब्धता के अनुसार बदलना जरूरी है। जल बचाना ही असली खेती है।” — हिरेंद्र साहू
महिला कृषक श्रीमती ऐश्वर्या हरीश देशमुख का प्रेरक संदेश
ग्राम पंचायत बघेरा की सफल महिला कृषक श्रीमती ऐश्वर्या हरीश देशमुख ने कहा —
“कम पानी में भी सफलता संभव है। मैंने सब्जी और दलहन की मिश्रित खेती कर जल की बचत के साथ आय में वृद्धि की है। महिलाएँ यदि जल संरक्षण को जीवनशैली बनाएं तो पूरा गांव आत्मनिर्भर बन सकता है।”
जनपद सदस्य श्रीमती पूर्णिमा कृष्णा साहू की अपील
जनपद सदस्य श्रीमती पूर्णिमा कृष्णा साहू ने कहा —
“हर किसान को जल प्रहरी बनना होगा। खेतों में वर्षा जल संचयन, पाइप सिंचाई और परंपरागत तालाबों का पुनर्जीवन ही स्थायी समाधान है।”

उन्होंने ग्रामीणों से जल संरक्षण को सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में अपनाने का आग्रह किया।
कृषि विशेषज्ञों की राय
कृषि वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि ग्रीष्मकाल में मूंग, उड़द, अरहर, मक्का, ज्वार और बाजरा जैसी फसलों को अपनाने से न केवल जल की बचत होगी बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी बनी रहेगी।
यदि किसान धान की खेती जारी रखना चाहें, तो “डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस (DSR)” तकनीक अपनाकर 20 से 30 प्रतिशत तक पानी की बचत की जा सकती है।

साझा संदेश – “जल ही जीवन है”
सभी जनप्रतिनिधियों और कृषकों का एक ही स्वर –
“हर बूंद अनमोल है, जल बचाना ही भविष्य है। यदि आज हम जल नहीं बचाएंगे, तो कल की पीढ़ी केवल स्मृतियों में पानी खोजेगी।”









































