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राजनांदगांव: लेही विधि से अंकुरित बीजों को मचाई किए हुए खेतों में ड्रम सीडर एवं छिटकवा विधि से करें बुवाई…

राजनांदगांव 17 जुलाई 2026। कृषि विज्ञान केन्द्र राजनांदगांव द्वारा एलनीनो के फसल में प्रभाव एवं बचाव हेतु विशेष सलाह दी गई है। किसानों को खेतों में पर्याप्त पानी की उपलब्धता होने पर मचाई कर नर्सरी उपलब्ध होने पर रोपाई करने अथवा नर्सरी की अनुपलब्धता पर लेही विधि से अंकुरित बीजों को मचाई किए हुए खेतों में ड्रम सीडर एवं छिटकवा विधि से बुवाई करने कहा गया है। साथ ही नर्सरी एवं बीजों को कवकनाशी (कार्बेन्डाजिम) एवं जैव उर्वरकों से उपचारित कर रोपाई एवं बुवाई करें।

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इस वर्ष अषाढ़ माह 1 जुलाई से प्रारंभ हुआ है। अषाढ़ माह से प्रारंभ होकर सावन मास की हरियाली अमावस्या अर्थात हरेली तिहार तक हम खरीफ फसल की बुआई एवं रोपाई कर सकते हैं। इस वर्ष हरेली 12 अगस्त को मनाई जाएगी।

जो किसान धान की सीधी बुआई करते हैं, उन्हें जमीन में बतर की स्थिति में 15 जुलाई तक धान की बुआई करने का परामर्श दिया गया है। रोपाई एवं बियासी पद्धति से धान की खेती करने वाले किसान 30 जुलाई तक रोपाई एवं बियासी का कार्य कर ले।

किसी असामान्य परिस्थिति के कारण विलंब होने से यदि किसान हरेली तक भी बुआई रोपाई का कार्य करते हैं, तो फसल के उत्पादन में ज्यादा नुकसान नहीं होगा। किसानों को इस वर्ष मानसून विलंब के कारण धान की शीघ्र एवं मध्यम अवधि में पकने वाली प्रजातियां एमटीयू 1010, एमटीयू 1153, एमटीयू 1156, एमटीयू 1001, विक्रम टीसीआर, छत्तीसगढ़ धान 1919, छत्तीसगढ़ तेजस्वी धान, महामाया सहित 125-130 दिन तक पकने वाले धान का उपयोग करने की सलाह दी गई है।


एक एकड़ में सीधी बुआई एवं बियासी के लिए 30 किलोग्राम, रोपा पद्धति में 20 किलोग्राम तथा हाइब्रिड प्रजाति के लिए 6 किलोग्राम बीज का उपयोग करें। जिन खेतों में अधिक जल भराव हो गया है तथा वर्षा रूक नहीं रही हो तो लेही पद्धति से धान की बोआई करें। इस विधि में धान के अंकुरित बीजों की खेत में बुआई की जाती है। वर्तमान परिपे्रक्ष्य में उन क्षेत्रों में लगातार वर्षा की स्थिति निर्मित होने के कारण धान की लेही विधि से बुवाई करना उपयुक्त रहेगा।

इस हेतु धान के खेत में पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध होने पर खेत की रोपा पद्धति की ही तरह अच्छी तरह से मचाई कर अंकुरित बीजों को ड्रम सीडर अथवा छिटकवा विधि से बुवाई करें। इस विधि में मध्यम अवधि में पकने वाली लगभग 120-130 दिन वाली विक्रम टीसीआर, छत्तीसगढ़ धान 1919, छत्तीसगढ़ तेजस्वी धान, महामाया, एमटीयू 1001 किस्म का चयन करें एवं इसके लिए बीज दर 40 किलोग्राम प्रति एकड़ उपयोग करते हुए बीजों को 8-10 घंटे पानी में भिगोना चाहिए। इन भीगे हुए बीजों का पानी निथार ले।

इसके बाद इन बीजों को पक्के फर्श पर रखकर बोरे से ठीक से ढक देना चाहिए। लगभग 24-30 घंटे में बीज अंकुरित हो जायेंगे। अब बोरे को हटाकर बीज को छाया में फैलाकर रखें एवं इन अंकुरित बीजों को ड्रम सीडर यंत्र उपलब्ध होने पर पंक्ति में बोवाई करें अथवा छिटकवा विधि से बुवाई करें।


बुआई के पूर्व बीज को कार्बेन्डाजिम या किसी अन्य कवकनाशी दवा से उपचारित कर लें। एक किलो बीज के लिए ढाई ग्राम दवा का प्रयोग करें। भूमि में नाइट्रोजन फास्फोरस एवं पोटेशियम की पूर्ति के लिए जैव उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए। धान में एजोस्पाइरिलम, पीएसबी, केएसबी का उपयोग करना चाहिए। इन तीनों तरल जैव उर्वरकों की 2-2 मिली मात्रा अर्थात 6 मिली तरल पदार्थ 4 मिली पानी में मिला लें। इस प्रकार तैयार 10 मिली के घोल से 1 किग्रा धान बीज को उपचारित कर दें। यह उपचार पौधों को लगभग 12 किलोग्राम नाइट्रोजन 8 किलोग्राम फास्फोरस एवं 5 किलोग्राम पोटेशियम प्रति एकड़ प्रदान करेगा।


रासायनिक दवाई से भी संकरी पत्ती एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का प्रभावकारी निंदा नियंत्रण किया जा सकता है। अंकुरण पूर्व निंदानाशक व्यवसायिक नाम- पेन्डीमेथीलीन स्टाम्प, पेंडीगोल्ड, पेंडीलीन, धानुटांप, पेनिडा, पेंडीहबे अन्य की 1000 मिली मात्रा को 150 लीटर पानी में घोलकर एक एकड़ में बुआई के 0 से 3 दिन के बीच छिड़काव करें।

पाइरेजोसल्फूरान व्यवसायिक नाम- साथी, सेवक, पाइरोसल्फ, लाठी अन्य 80 मिली मात्रा को 150 लीटर पानी में मिलाकर बोने के 0 से 3 दिन बाद तक एक एकड़ खेत में छिड़काव करें। बिसपायरी बेक सोडियम व्यवसायिक नाम- नोमीनी गोल्ड, एडोरा, स्ट्राइडर, बिसफोर्स अन्य 100 मिली मात्रा को 150 लीटर पानी में मिलाकर 1 एकड़ खेत में बोने अथवा रोपाई के 20 से 25 दिन के बाद छिड़काव करें।

क्लोरीम्यूरान इथाइल $ मेटसल्फ्यूरान मिथाइल व्यवसायिक नाम- आलमिक्स, धारमिक्स, दिग्गज आदि की 8 मिली दवा को 150 लीटर पानी मिलाकर 1 एकड़ खेत में बोने अथवा रोपाई के 20 से 25 दिन के बाद छिड़काव करें।

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