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कालापानी की पीड़ा से विकास की नई उड़ान तक… बदलते अंडमान की अनूठी कहानी

आठ दिन की यात्रा में दिखा इतिहास, समुद्री सुरक्षा, विज्ञान, तकनीक और आधुनिक विकास का अद्भुत संगम

जितेंद्र नाथ मिश्रा | राजनांदगांव

समुद्र की अथाह नीली लहरों के बीच बसे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह का नाम सुनते ही कभी अंग्रेजों की यातनाओं, सेल्युलर जेल की कालकोठरियों और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की तस्वीर आंखों के सामने उभरती थी। लेकिन आज यही द्वीपसमूह आधुनिक भारत के विकास, वैज्ञानिक अनुसंधान, डिजिटल कनेक्टिविटी, समुद्री सुरक्षा और पर्यटन की नई इबारत लिख रहा है। कभी देश से हजारों किलोमीटर दूर निर्वासन और पीड़ा का प्रतीक रहा अंडमान अब विकास की नई संभावनाओं का द्वीप बनकर उभर रहा है।

इसी बदलते अंडमान को करीब से देखने और समझने का अवसर फरवरी 2026 में मिला। भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) की पहल पर छत्तीसगढ़ के पत्रकारों का एक दल आठ दिवसीय अध्ययन एवं मीडिया भ्रमण पर अंडमान-निकोबार पहुंचा। राज्य के विभिन्न हिस्सों से चयनित पत्रकारों के इस दल में राजनांदगांव से मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला। यह यात्रा महज पर्यटन नहीं, बल्कि समुद्र के बीच बसे भारत के इस सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में हो रहे बदलावों को समझने का एक अनूठा अनुभव थी।

रायपुर से पोर्ट ब्लेयर तक: शुरू हुआ यादगार सफर

8 फरवरी की शाम राजनांदगांव से शुरू हुआ सफर रायपुर एयरपोर्ट पहुंचकर एक नए उत्साह में बदल गया। यहां छत्तीसगढ़ के अन्य पत्रकार साथियों से मुलाकात हुई। रात करीब 9.15 बजे रायपुर से हैदराबाद के लिए उड़ान भरी। हैदराबाद में रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन अंडमान की यात्रा शुरू हुई।

9 फरवरी को जब विमान पोर्ट ब्लेयर की ओर बढ़ रहा था, तब खिड़की से दिखाई देता नीला समुद्र और उसके बीच बिखरे हरे-भरे द्वीप किसी खूबसूरत चित्रकारी से कम नहीं थे। पहली बार अंडमान की धरती पर कदम रखने का रोमांच अलग ही था। स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों ने पत्रकार दल का स्वागत किया, लेकिन यहां पहुंचते ही विश्राम के बजाय अध्ययन भ्रमण का सिलसिला शुरू हो गया।

सुनामी की त्रासदी से सबक, आपदा प्रबंधन की मजबूत तैयारी

यात्रा का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) का परिसर रहा। वर्ष 2004 की विनाशकारी सुनामी ने अंडमान-निकोबार सहित हिंद महासागर के कई क्षेत्रों को गहरे जख्म दिए थे। उस त्रासदी के बाद द्वीपसमूह में आपदा प्रबंधन को अधिक मजबूत और व्यवस्थित बनाने की दिशा में लगातार काम किया गया है।

एनडीआरएफ के सहायक कमांडेंट श्रीधर आर. ने पत्रकारों को आपदा प्रबंधन की चुनौतियों और तैयारियों से अवगत कराया। उनका छत्तीसगढ़ के सुकमा क्षेत्र में भी कार्य करने का अनुभव रहा है। उनसे बातचीत में यह जानना दिलचस्प रहा कि भौगोलिक रूप से दूर-दूर तक फैले द्वीपों में किसी आपदा के दौरान राहत और बचाव कार्य कितने चुनौतीपूर्ण होते हैं।

करीब 836 द्वीपों वाले इस क्षेत्र में सुनामी, भूकंप और चक्रवात जैसी आपदाओं से निपटने के लिए चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित निकासी मार्ग और जनजागरूकता पर विशेष जोर दिया जा रहा है। लगभग 35 स्थानों पर सायरन आधारित चेतावनी व्यवस्था विकसित की गई है। यहां यह स्पष्ट हुआ कि आपदा प्रबंधन का वास्तविक अर्थ केवल घटना के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि संकट से पहले समाज को तैयार करना है।

वैज्ञानिक खेती से आत्मनिर्भरता की राह

इसके बाद पत्रकार दल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय द्वीपीय कृषि अनुसंधान संस्थान (सीआईएआरआई) पहुंचा। संस्थान के निदेशक डॉ. जय सुंदर ने बताया कि द्वीपों की जलवायु, मिट्टी और सीमित भूमि संसाधनों के कारण यहां खेती के लिए अलग तरह की वैज्ञानिक रणनीति की जरूरत होती है।

संस्थान में विकसित एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल में फसल उत्पादन, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, जैविक पोषक तत्व प्रबंधन और जल संरक्षण को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इसका उद्देश्य कम भूमि में अधिक उत्पादन और किसानों की आय के विविध स्रोत तैयार करना है।

अंडमान में नारियल और सुपारी के ऊंचे-ऊंचे पेड़ यहां की कृषि पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वहीं पशुपालन में हरे चारे की उपलब्धता जैसी चुनौतियों के समाधान पर भी वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। समुद्र से घिरे इस क्षेत्र में मछली स्थानीय भोजन और आजीविका का अभिन्न हिस्सा है।

समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में नौसेना की अहम भूमिका

अंडमान-निकोबार का सामरिक महत्व इसे देश की सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण बनाता है। पत्रकार दल को भारतीय नौसेना के कमांड सेंटर में समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक क्षमताओं की जानकारी दी गई।

यहां आईएन एलसीयू एल-58 जैसे स्वदेशी लैंडिंग क्राफ्ट यूटिलिटी जहाज और आईएनएस कुलिश के बारे में बताया गया। आधुनिक युद्धपोत केवल समुद्री सीमाओं की निगरानी और सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर राहत एवं बचाव अभियानों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नौसेना की कार्यप्रणाली और समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को करीब से समझना पत्रकारों के लिए विशेष अनुभव रहा।

सेल्युलर जेल: जहां आज भी गूंजती है आजादी की कहानी

अंडमान की यात्रा का सबसे भावुक और ऐतिहासिक पड़ाव था सेल्युलर जेल। कभी अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता और स्वतंत्रता सेनानियों पर किए गए अत्याचारों का गवाह रहा यह परिसर आज राष्ट्रीय गौरव और बलिदान का प्रतीक है।

जेल में आयोजित लाइट एंड साउंड शो के दौरान जब कालापानी की सजा, वीर स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और उनके बलिदान की गाथा सुनाई गई तो मन भावुक हो उठा। जेल की कालकोठरियां आज भी उस दौर की पीड़ा का एहसास कराती हैं। यहां खड़े होकर महसूस होता है कि आजादी केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि असंख्य बलिदानों का परिणाम है।

बारातांग: प्रकृति की हजारों साल पुरानी कलाकृति

अंडमान की प्राकृतिक सुंदरता को करीब से देखने के लिए बारातांग की यात्रा बेहद यादगार रही। घने जंगलों, समुद्री जलमार्गों और मैंग्रोव क्षेत्रों से गुजरते हुए पत्रकार दल लाइमस्टोन गुफाओं तक पहुंचा।

इन गुफाओं में हजारों वर्षों की प्राकृतिक प्रक्रिया से बनी स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट संरचनाएं दिखाई देती हैं। कहीं छत से लटकती चूना पत्थर की आकृतियां हैं तो कहीं जमीन से ऊपर उठते प्राकृतिक स्तंभ। पानी की बूंदों और खनिजों के लगातार जमाव ने प्रकृति की इस अद्भुत कलाकृति को आकार दिया है।

बारातांग के मड वॉल्केनो ने भी सभी का ध्यान आकर्षित किया। यह क्षेत्र अंडमान की विशिष्ट भूगर्भीय संरचना और प्राकृतिक विविधता का परिचय कराता है।

आज़ाद हिंद सेतु: समुद्र के ऊपर विकास की मजबूत कड़ी

उत्तर और मध्य अंडमान को जोड़ने वाला लगभग 1.45 किलोमीटर लंबा आज़ाद हिंद सेतु विकास की बदलती तस्वीर का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। पहले इस मार्ग पर वाहनों और यात्रियों को फेरी का इंतजार करना पड़ता था। मौसम खराब होने पर आवागमन और कठिन हो जाता था। पुल बनने से यात्रा अधिक सुगम और व्यवस्थित हुई है।

यह पुल केवल दो भौगोलिक हिस्सों को नहीं जोड़ता, बल्कि चिकित्सा, शिक्षा, बाजार और प्रशासनिक सुविधाओं तक पहुंच आसान बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समुद्र के ऊपर खड़ी यह संरचना बताती है कि दूरस्थ द्वीपों में बुनियादी ढांचे का विकास लोगों के जीवन में कितना बड़ा बदलाव ला सकता है।

समुद्र के नीचे इंटरनेट की नई दुनिया

अंडमान-निकोबार में डिजिटल कनेक्टिविटी की कहानी भी किसी तकनीकी उपलब्धि से कम नहीं है। चेन्नई से अंडमान तक समुद्र के नीचे बिछाई गई ऑप्टिकल फाइबर केबल ने इस क्षेत्र को तेज इंटरनेट कनेक्टिविटी से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पहले सीमित उपग्रह आधारित कनेक्टिविटी के कारण इंटरनेट की गति और क्षमता बड़ी चुनौती थी। समुद्र के नीचे बिछी इस केबल से ऑनलाइन शिक्षा, टेली-मेडिसिन, ई-गवर्नेंस, पर्यटन और व्यापार को नई गति मिली है।

हजारों किलोमीटर दूर समुद्र की गहराइयों में बिछी यह केबल आधुनिक भारत की उस तकनीकी क्षमता का उदाहरण है, जो भौगोलिक दूरियों को भी कम कर रही है।

समुद्र में छिपी आजीविका की संभावनाएं: एनआईओटी का अनूठा काम

राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) में पत्रकार दल को समुद्र आधारित अनुसंधान और आजीविका के नए अवसरों की जानकारी मिली। प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रभारी डॉ. दिलीप कुमार झा ने बताया कि समुद्र केवल परिवहन और मछली पकड़ने का माध्यम नहीं, बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए भी अपार संभावनाएं रखता है।

ओपन सी केज कल्चर के जरिए खुले समुद्र में विशेष पिंजरों में मछली पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। कृत्रिम रीफ के माध्यम से समुद्री जीवों के लिए नए आवास तैयार करने और मत्स्य संसाधनों को बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। वहीं सीवीड यानी समुद्री शैवाल की खेती स्थानीय लोगों के लिए आजीविका का नया विकल्प बन सकती है।

भारत के डीप ओशन मिशन के अंतर्गत समुद्रयान परियोजना भी यहां के वैज्ञानिक प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके तहत तीन लोगों को लगभग 6,000 मीटर समुद्र की गहराई तक ले जाने में सक्षम मानवयुक्त पनडुब्बी विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। समुद्र की सतह से नीचे छिपी दुनिया को समझने का यह प्रयास भारत की वैज्ञानिक महत्वाकांक्षाओं का परिचायक है।

जैव विविधता का खजाना है अंडमान

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के अधिकारियों से बातचीत में अंडमान-निकोबार की समृद्ध जैव विविधता के बारे में जानने का अवसर मिला। यहां अनेक प्रकार के पक्षी, तितलियां, समुद्री जीव, कोरल रीफ, समुद्री कछुए और नारियल केकड़े पाए जाते हैं। लेदरबैक कछुए और नारियल केकड़े जैसे जीव इस क्षेत्र की विशिष्ट प्राकृतिक पहचान हैं।

यहां की जैव विविधता केवल पर्यटन का आकर्षण नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर है। इसके संरक्षण के लिए संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र और समुद्री पर्यावरण को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है।

लॉन्ग आइलैंड: समुद्र के साथ जीने की अलग दुनिया

यात्रा के दौरान लॉन्ग आइलैंड, रंगत और आसपास के द्वीपीय क्षेत्रों को देखने का अवसर भी मिला। फेरी और समुद्री रास्तों से गुजरते हुए यहां के जीवन को करीब से समझा जा सकता है। छोटे-छोटे द्वीप, जेट्टी, मछुआरे समुदाय और समुद्र पर निर्भर आजीविका इस क्षेत्र की वास्तविक जीवनशैली को दर्शाते हैं।

मुख्यभूमि भारत से वर्षों पहले आकर बसे परिवारों ने भी अपनी संस्कृति और परंपराओं को यहां जीवंत रखा है। हर द्वीप की अपनी अलग पहचान और जीवन की अपनी गति है।

कालापानी से विकास के द्वीपों तक: बदल रहा है अंडमान

आठ दिनों की इस यात्रा ने अंडमान-निकोबार की एक ऐसी तस्वीर सामने रखी, जो इतिहास और आधुनिकता के बीच एक अनूठा संतुलन स्थापित करती है। एक ओर सेल्युलर जेल स्वतंत्रता संग्राम की पीड़ा और गौरव की याद दिलाती है, तो दूसरी ओर समुद्र पर बने पुल, आधुनिक डिजिटल नेटवर्क, वैज्ञानिक संस्थान और नौसेना की मजबूत उपस्थिति नए भारत की क्षमताओं का परिचय कराते हैं।

हालांकि विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण की चुनौती भी कम नहीं है। मैंग्रोव, कोरल रीफ, दुर्लभ समुद्री जीवों और संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों को बचाते हुए विकास की गति बनाए रखना जरूरी है। पर्यटन और बुनियादी ढांचे का विस्तार प्रकृति के संतुलन को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए।

यादों में बस गया नीला समुद्र और बदलता भारत

वापसी के समय मन में सेल्युलर जेल की कालकोठरियां, बारातांग की प्राचीन गुफाएं, घने जंगलों के बीच से गुजरती सड़कें, समुद्र के ऊपर बना विशाल पुल, समुद्र के नीचे दौड़ती इंटरनेट की केबल, नौसेना के युद्धपोत और वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाएं एक साथ घूम रही थीं।

यह यात्रा केवल एक पत्रकार का भ्रमण नहीं, बल्कि भारत के उस हिस्से को समझने का अवसर थी, जो भौगोलिक रूप से मुख्यभूमि से दूर होते हुए भी राष्ट्रीय सुरक्षा, विज्ञान, तकनीक और विकास के केंद्र में है।

कभी कालापानी की पीड़ा से पहचाने जाने वाले इन द्वीपों में आज उम्मीदों और संभावनाओं की नई लहर दिखाई देती है। समुद्र की लहरें अब भी वैसी ही हैं, जंगल अब भी उतने ही घने हैं, लेकिन समय बदल चुका है। अब इन द्वीपों तक केवल जहाज और फेरी नहीं पहुंचते, बल्कि आधुनिक सड़कें, पुल, इंटरनेट, विज्ञान और विकास की नई ऊर्जा भी पहुंच रही है।

अंडमान-निकोबार को देखकर लौटना एक अनुभव था, लेकिन उसे बदलते हुए महसूस करना इस आठ दिवसीय यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।