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राजनांदगांव: 66 ज्योति कलशों से जगमगाया मां का दरबार, 1985 से निभ रही आस्था की परंपरा…

महरूम कला में नवरात्रि पर विशेष आयोजन, विसर्जन के लिए शीतला तालाब तक निकलेगी दो किलोमीटर की यात्रा

ठेलकाडीह। शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर ग्राम महरूम कला स्थित सार्वजनिक दुर्गा मंच में भक्ति और आस्था का अनूठा नजारा देखने को मिल रहा है।

यहां प्रज्वलित 66 ज्योति कलश मां दुर्गा के प्रति श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और विश्वास के प्रतीक बने हुए हैं। वर्ष 1985 से चली आ रही ज्योति कलश प्रज्वलन की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। ज्योति कलशों के दर्शन के लिए श्रद्धालु मां के दरबार पहुंचकर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना कर रहे हैं।

1985 से निरंतर निभाई जा रही परंपरा

महरूम कला के सार्वजनिक दुर्गा मंच में वर्ष 1985 से प्रतिवर्ष मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं। समय के साथ यह आयोजन गांव की धार्मिक आस्था और सामूहिक सहभागिता का प्रमुख केंद्र बन गया है।

इस वर्ष 66 ज्योति कलश प्रज्वलित कर मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। श्रद्धालु इन ज्योतियों को अपनी मनोकामनाओं, सुख-शांति और समृद्धि से जोड़कर देखते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने से मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

श्रद्धा के साथ निकलेगी दो किलोमीटर की विसर्जन यात्रा

नवरात्रि के धार्मिक अनुष्ठानों के समापन पर ज्योति कलशों का विसर्जन शीतला तालाब में किया जाएगा। इसके लिए लगभग दो किलोमीटर की यात्रा तय की जाएगी। विसर्जन के दौरान श्रद्धालु भक्तिभाव के साथ शामिल होंगे। ज्योति कलशों के विसर्जन के साथ नवरात्रि के इस विशेष धार्मिक आयोजन का समापन होगा।

समिति के नेतृत्व में आगे बढ़ रही परंपरा

सार्वजनिक दुर्गा मंच महरूम कला के अध्यक्ष तेजराम वर्मा हैं, जबकि प्रवीण पारख संरक्षक की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। प्रवीण पारख ने बताया कि वर्ष 1985 से चली आ रही परंपरा के तहत हर साल मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है और ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं। ग्रामीणों की आस्था और सहयोग से यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है। विशेष बात यह है कि प्रतिवर्ष श्रद्धालु अपने खर्च से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने में योगदान देते हैं।

आस्था, समर्पण और सामूहिक सहभागिता की पहचान

महरूम कला का यह धार्मिक आयोजन बताता है कि किसी परंपरा की पहचान केवल भव्यता से नहीं, बल्कि लोगों की श्रद्धा, समर्पण और निरंतर सहभागिता से बनती है।

चार दशकों से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा गांव की धार्मिक विरासत को सहेजने के साथ नई पीढ़ी को भी आस्था और सामूहिक सहयोग का संदेश दे रही है। 66 ज्योति कलशों से आलोकित मां का दरबार आज श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना हुआ है।

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